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सेवा से समृद्धि

'सेवा में छिपा समृद्धि का मंत्र',शीर्षक से लिखे आलेख में वरिष्ठ अर्थशास्त्री एवं आईआईएम बेंगलुरु के पूर्व प्रोफेसर डॉ भरत झुनझुनवाला ने देश की आर्थिक स्थिति में बदलाव के लिए गलत दिशा में किये जा रहे प्रयासों की ओर इंगित किया है।डॉ साहब के लेख अत्यंत प्रासंगिक और नई सोच के साथ समस्या का समाधान बतलाते हैं...          अर्थशास्त्र का साधारण सा सिद्धांत है,मांग से ज्यादा पूर्ति होने पर कीमत गिर जाती है।आज जिस तीव्र गति से हम उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान दे रहें उस गति से मांग नहीं बढ़ रही,जो किसानी नुकसान की मूल वजह है और साथ ही साथ उत्पादन लागत की वृद्धि ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। दूध और खाद्य उत्पादन का उदाहरण देकर डॉ साहब ने बड़ी रोचक और तथ्यात्मक बात रखी है,आज इसके नकारात्मक प्रभाव से बचाव के जितने भी उपाय किये जा रहे वो व्यवहारिकता की कसौटी पर खरे नही उतर रहे। अमेरिका जैसे विकसित देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि की हिस्सेदारी मात्र 1%है वहीं सेवा क्षेत्र 90% हिस्सेदारी के साथ उसे विकसित बनाने में अहम भूमिका निभा रहा..और दूसरी ओर भारत अभी भी 18%कृषि हि...

ट्रेड वार और भारत

चीन और अमेरिका के मध्य चल रहे ट्रेड वार से पूरे विश्व की आर्थिक जगत में खलबली मच गई है,भारतीय शेयर बाजार भी इससे अनछुए नही हैं।खरीफ फसलों की MSP के निर्धारण में बढ़ोतरी से सत्ता पक्ष के प्रति विश्वास में बढ़ोतरी हुई है और अच्छे मानसून की उम्मीद की वजह से शेयर बाज़ार में मजबूती देखी जा रही,लेकिन इस ट्रेड वार की वजह से कच्चे तेल के भाव में अप्रत्याशित वृद्धि देखी जा सकती जिससे विकासशील देशों में मुद्रा स्फीर्ति होना तय है,मगर भारतीय अर्थव्यस्था में अभी हुए हालिया कुछ क्रांतिकारी बदलाव की वजह से इसके असर काफी कम पड़ेंगे।लोकसभा चुनाव नजदीक है जिस वजह से सत्ता पक्ष फूंक-फूंक के पांव रख रही है और चीन-अमेरिका के मध्य चल रहे 'ट्रेड वार' में खुद को लगभग उदासीन ही रखा है।   कई अर्थशास्त्रियों का मानना है,'यह अमेरिका की सोची समझी रणनीति का हिस्सा है',आज पूरे विश्व की मांगों की पूर्ति करने वाला एक मात्र देश चीन है जो इस व्यापारिक समर में जिस गति से अपना परचम लहरा रहा उससे 2030 तक वह दुनिया का सबसे ताकतवर देश बन जायेगा और इसी समीकरण को अपनी ओर साधने का प्रयत्न अमेरिका कर रहा। भारत...

दिल्ली फैसले से बिहार को नई राह

दिल्ली मामले के सुप्रीम के फैसले पर बिहार को उम्मीद दिल्ली में 'आम आदमी पार्टी'और 'उपराज्यपाल' के मध्य का खींचतान सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ अपने-अपने अधिकार सीमा में वापस आना,किसी पार्टी के जीत से कहीं बढ़कर लोकतंत्र की जीत है।      सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 239AA को स्पष्ट करते हुए कहा कि दिल्ली को कभी भी पूर्ण राज्य का दर्जा नही दिया जा सकता इसलिए केजरीवाल इसकी वकालत छोड़ के उपराज्यपाल के साथ सामंजस्य बिठाकर दिल्ली की जनता की मूलभूत आवश्यकता की पूर्ति पर ध्यान केंद्रित करें,वहीं कोर्ट ने उपराज्यपाल को निर्देशित किया है कि वो मंत्रिमंडल के द्वारा लिए फैसले  को स्वीकार करने को बाध्य हैं,किसी विशेष मतभेद की स्थिति में राष्ट्रपति का फैसला सर्वमान्य होगा।उपराज्यपाल के पास भूमि,पुलिस और कानून व्यवस्थता की जिम्मेवारी है।         बिहारी होने के नाते मैं इस फैसले में बिहार के भविष्य निर्धारण की एक नई पहल की गुंजाइश को देख पा रहा हूँ,क्यों न बिहार सरकार भी 'विशेष राज्य के दर्जा'की मांग न्यायपालिका के माध्यम से अपनी अधिकार सीमा क...

जो अपने लिए कभी नही जीता,पुरुष के उस रूप को कहते हैं पिता

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जीवन मे हर पल जंग लड़ता वो वीर

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स्वर्ग की तलाश

                    'स्वर्ग की तलाश' दिल्ली की बुराड़ी में एक परिवार के 11 लोगों की सन्देहास्पद मौत ने "जीवन की अनिश्चितता और उसके प्रति मानवीय असजगता" को रेखांकित कर रही।             'मोक्ष' की प्राप्ति की चाहत, पहली नज़र में सामूहिक खुदकुशी से यही तथ्य सामने आ रहा है।अगर यह सत्य है, तो आज यह समझने का वक़्त आ गया है कि खुद को विवेकवान कहने वाला यह इंसान कहीं भीतर से खोखला तो नहीं...      'स्वर्ग और नरक' कोई भौगोलिक स्थान के नाम नही हैं,यह हमारे भीतर हैं...हम खुद को जैसा बनाते हैं बस उसकी परिणिति है...         आज स्वर्ग की लालसा इसलिए तीव्र हो गयी है,क्योंकि हम खुद के भीतर नरक का निर्माण कर रहे और अन्यत्र किसी दूसरे लोक में स्वर्ग की परिकल्पना कर रहें...       'स्वर्ग हमारे भीतर है',बस...स्वच्छंद और सजग होकर जीवन का भरपूर आनंद लेकर हम खुद के भीतर स्वर्ग का निर्माण कर सकते हैं...              प्रभाकर कुमार 'माचवे'  ...

अब जाग तू

         जब जागे ....तभी सवेरा... अंधकार भरी रात को,कब का सूरज खा चुका.... और तू नींद के आगोश में है सो रहा... क्यों तू अपनी किस्मत पर है रो रहा? अरे जाग,सवेरा कर रहा तेरा इंतेज़ार... हताश होकर न थम तू,बंदिशों में न खुद को जकड़ तू... उठ चल,देख..."आज"तुझे पुकार रहा.... और तू न जाने किस दुनिया में खुद को भुला रहा...   " जब जागे तभी सवेरा" आलस्य की चादरों को फेंक कर,संकल्प के हल को थामकर... घर से निकल तू.. देख,सवेरा कर रहा तेरा इंतज़ार... जाग तो सही... "आज" को तेरी जरूरत है... और तू बीते कल में खुद को खो रहा... नींद के आगोश में सो रहा... क्यों तू अपनी किस्मत पर रो रहा? मत हो यूं हताश... आज को है तेरी तलाश.. खुद पर रख इतना विश्वास... अरे जाग तू,कब तक रहेगा यूं सोया... अतीत में यूं खुद को खोया... "जब जागे ....तभी सवेरा"..

बचपन कर रहा नशा...

बचपन कर रहा नशा...जवानी मदहोशी में है फना... बड़े शिद्दत से हथेली को अंगूठे से रगड़कर... न जाने कहाँ है,और कितना बेखबर... मुँह से एक अजीब सी 'कस'को खींचकर... अंधेरे में गुज़ार रहा अपना रौशन सहर.... बचपन कर रहा नशा...जवानी मदहोशी में है फना...                     ....बेफिक्र है दोनों..... आने वाली कयामत को लेकर..एक अजीब सी आफत को लेकर... ये तूफान के आने के पहले का सन्नाटा है... सिगरेट के धुंए को फेफड़े से गुजारकर ,यह बतलाना चाह रहा.... बेकौल हवाओं को भी कैद कर लेंगे हम.... मौत को भी जीत लेंगे हम... बचपन कर रहा नशा...जवानी मदहोशी में है फना... किस दौर में जी रहें ये... मौत को बुलावे का दावत दे रहे ये... अजीब पहेली है,जिससे लगता है सबसे ज्यादा डर... उसके और करीब जाकर जश्न मनाता है.... खुद को खोकर न जाने क्या पाता है .. बचपन कर रहा नशा...जवानी मदहोशी में है फना... गिलासों को टकराकर,क्या बतलाना चाहती है ये जवानी... "सोमरस" के पान से मदहोश होकर,क्या दिखलाना चाहती है जवानी... गजब तो तब हुआ......       जब कहता ह...

चल करते एक नया अनुसंधान...

चल करते एक नया अनुसंधान... तू मेरी गीता पढ़ ले,मैं पढ़ता हूँ तेरा कुरान... पहले बन तो जाए इंसान.. बाद में बनेंगे,हिन्दू या मुसलमान... कब से इतने मतलबी हो गए हैं हम... बेच दिया अपना ईमान... चल करते एक नया अनुसंधान... तू मेरी गीता पढ़ ले,मैं पढ़ता हूँ तेरा कुरान.... तू मेरी दीवाली की मिठाईयां खा ले, और मैं शौक से खाऊं तेरी ईद की सेवईयां... चल अब इंसान बनके,मिटा दें मजहब की ये दूरियां... अब तू ठान ले,नहीं है कोई मजबूरियां... अपनेपन से भी क्या कोई बड़ी है खुशियां... चल करते एक नया अनुसंधान... तू मेरी गीता पढ़ ले,मैं पढ़ता हूँ तेरा कुरान... तू मेरे मंदिर पर मत्था टेक, और मैं करूं तेरे मस्जिद में इबादत... चल अब हम करते हैं,एक दूजे से बेपनाह मोहब्बत... खुद-ब-खुद नेस्तनाबूत हो जाएगी,हमको अलग करने वाली ताकत... चल करते हैं,एक दूजे की सलामती के लिए इबादत... मुझे पूरा यकीन है... जरूर होगी खुदा की रहमत... हमारे मुल्क की होगी बरकत... पूरी होगी हमारी हर हसरत... चल करते एक नया अनुसंधान.... तू मेरी गीता पढ़ लें,मैं पढ़ता हूँ तेरा कुरान... अपना और तेरा दोनों के लहू का रंग लाल है... यह...

सार्वजनिक परिवहन: समय की मांग

जीवन में लोग इतने सिमटते जा रहे हैं,धन से सामर्थ्य लोग लालसाओं में इतने घिर चुके हैं कि उन्हें अब सार्वजनिक जीवन के उल्लास में अजीब सी बेचैनी का आभास होने लगा है,पहले लोग शौक से सार्वजनिक परिवहन से यात्रा कर जीवन की समग्रता का लाभ लेना ,व्यवहारिक ज्ञान से खुद को लबरेज करना चाहते थे,मगर आज परिस्थिति बिल्कुल विपरीत हो चुकी है,अपने निजी वाहन से यात्रा करना सुविधा से ज्यादा झूठी शान की पेशगी का विषय बनता जा रहा..व्यक्ति खुद को लोगो की नज़र में स्थापित करने की चाह में इतना मशगूल हो गया है कि उसे सार्वजनिक परिवहन से यात्रा करने से होने वाले लाभ की जानकारी होने के बावजूद भी अपनी प्रतिष्ठा और शान की स्थापना करने की स्वार्थता को छिपाते हुए अपनी जरूरत का रोना रो रहा है,जो काफी हास्यस्पद है।अगर हम सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करें तो ये हमे संसाधन की बचत के साथ -साथ व्यवहारिक ज्ञान से भी हमें रूबरू कराएगा,सड़क जाम की समस्या का मूल कारण निजी वाहन की अधिकता भी है,पर्यावरण प्रदूषण जैसी भयानक समस्या से भी हमें कुछ हद तक निजात मिल सकता है...अतः एक छोटी पहल की जाए,यथासम्भव सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल...