अपने या सपने
रात के एकांत में जब मनुष्य खुद से संवाद करते हुए अपने निर्णयों को टटोलता है, तो अक्सर उसके सामने दो ही राहें होती हैं- अपने या सपने... कोई अपनों की मुस्कुराहट के लिए अपने सुनहरे सपनों को तिलांजलि दे देता है, तो कोई अपने सपनों की ऊँचाई के लिए अपनों से ही दूर चला जाता है.... मगर सच कहें तो दुःखी दोनों ही हैं.. . पहला व्यक्ति जब रात को बिस्तर पर करवटें बदलता है तो उसके भीतर एक हूक उठती है— “काश, मैंने वो सपना पूरा किया होता !” और दूसरा जब अपनी सफलता की सीढ़ियों पर अकेला खड़ा होता है, तो उसे भी कहीं न कहीं अपनेपन की कमी सालती है— “काश, ये सब बाँटने के लिए अपने साथ होते !” दरअसल, जीवन किसी गणितीय समीकरण की तरह सरल नहीं है... यहाँ ‘सही’ और ‘ग़लत’ का तराजू अक्सर परिस्थितियों और स्वभाव से झुकता है.. कभी परिवार की जिम्मेदारियाँ और रिश्तों का दबाव हमें ऐसा निर्णय लेने पर मजबूर करता है, जिससे अपने सपनों को रोकना पड़ता है.… और कभी हमारे भीतर का स्वभाव—आज़ादी की प्यास, उड़ान की ललक—हमें अपनों से दूर खींच ले जाती है... जरा सोचिए, जो पुत्र गाँव में रहकर ...