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अपने या सपने

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रात के एकांत में जब मनुष्य खुद से संवाद करते हुए अपने निर्णयों को टटोलता है, तो अक्सर उसके सामने दो ही राहें होती हैं-  अपने या सपने...  कोई  अपनों की मुस्कुराहट के लिए अपने सुनहरे सपनों को तिलांजलि दे देता है, तो कोई अपने सपनों की ऊँचाई के लिए अपनों  से ही दूर चला जाता है.... मगर सच कहें तो  दुःखी दोनों ही हैं.. . पहला व्यक्ति जब रात को बिस्तर पर करवटें बदलता है तो उसके भीतर एक हूक उठती है— “काश, मैंने वो सपना पूरा किया होता !”  और दूसरा जब अपनी सफलता की सीढ़ियों पर अकेला खड़ा होता है, तो उसे भी कहीं न कहीं अपनेपन की कमी सालती है— “काश, ये सब बाँटने के लिए अपने साथ होते !” दरअसल, जीवन किसी गणितीय समीकरण की तरह सरल नहीं है... यहाँ ‘सही’ और ‘ग़लत’ का तराजू अक्सर परिस्थितियों और स्वभाव से झुकता है.. कभी परिवार की जिम्मेदारियाँ और रिश्तों का दबाव हमें ऐसा निर्णय लेने पर मजबूर करता है, जिससे अपने सपनों को रोकना पड़ता है.… और कभी हमारे भीतर का स्वभाव—आज़ादी की प्यास, उड़ान की ललक—हमें अपनों से दूर खींच ले जाती है... जरा सोचिए, जो पुत्र गाँव में रहकर ...

क्या भारत में हो सकते तख्तापलट ?

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क्या भारत में हो सकता तख़्तापलट? भारत आज़ादी के बाद से जिस लोकतांत्रिक राह पर बढ़ा है, वहाँ तख़्तापलट की संभावना पर चर्चा अपने आप में रोचक भी है और गंभीर भी...अभी जिस तरह से दक्षिण एशियाई देशों में जिस तीव्रता के साथ   रातों-रात सत्ता बदलते देखा है,उससे इस बिंदु पर विचार करना लाज़मी हो गया है...कई देशों में बंदूक़ की नली पर लोकतंत्र को गिरफ़्तार कर लिया गया, लेकिन भारत के मामले में सवाल उठता है—क्या यहाँ ऐसा संभव है ? इसका उत्तर है— इतनी आसानी से नहीं.. . इसके पीछे कई ठोस कारण हैं, जो हमारे लोकतंत्र की मज़बूत नींव को दर्शाते हैं... सबसे पहली बात, भारत का संविधान सिर्फ़ एक कानूनी किताब नहीं है, बल्कि यह समाज की विविधता और लोकतंत्र की गहराई को समेटे हुए है... इसका सबसे बड़ा गुण है लचीलापन...  जब भी देश में सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक दबाव बढ़ा, तो संविधान ने संशोधन और व्याख्या के रास्ते खोल दिए..यही वजह है कि किसी भी वर्ग या समुदाय को ऐसा महसूस नहीं होता कि उनकी आवाज़ पूरी तरह दबा दी गई है.. दूसरी बात आती है भारत के संघीय ढाँचे की... यहाँ सत्ता सिर्फ़ केंद्र...

नेपाल में हुए विद्रोह का पूरा सच

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नेपाल में उठती अशांति और भारत की चिंता नेपाल की सड़कों पर जो हलचल मची है, उसकी गूँज केवल काठमांडू की गलियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के कानों तक भी पहुँच रही है। पिछले तीन वर्षों में भारत के तीन पड़ोसी देशों में हिंसक और अराजक तख़्तापलट हो चुके हैं। सवाल यह है कि क्या यह सब सचमुच जनता की स्वतःस्फूर्त आवाज़ है या इसके पीछे कोई गहरी साज़िश बुन रही है? अक्सर लोग मान लेते हैं कि यह सब छात्रों या GenZ युवाओं के आकस्मिक आंदोलन हैं, लेकिन यह सोच सरासर भ्रम है.. दरअसल, दुनिया की बड़ी ताक़तें किसी भी देश में अपने-अपने स्वार्थ साधने के लिए अदृश्य चालें चलती रहती हैं। जब तक सत्ता उनके अनुकूल रहती है, सब ठीक रहता है। लेकिन जैसे ही कोई मज़बूत नेतृत्व उनके हितों पर रोक लगाता है, तभी ये महाशक्तियाँ सक्रिय होकर उस सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करती हैं। उनकी चाल का तरीका भी तय होता है। सबसे पहले विपक्ष को मज़बूत किया जाता है, चुनावी फंडिंग कराई जाती है और अपने मीडिया नेटवर्क व इंटरनेट कंपनियों के माध्यम से वातावरण बनाया जाता है। जब यह उपाय नाकाम होते हैं, तब तख़्तापलट की योजना ...

शिक्षक कौन ?

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शिक्षक कौन? शिक्षक—सिर्फ एक पेशे का नाम नहीं, बल्कि जीवन की अनवरत धारा है... वह वही है, जो सड़क की तरह खुद यथास्थान रहकर अनगिनत कदमों को मंज़िल तक पहुँचा देता है... उसका जीवन अपने लिए कम और दूसरों के लिए ज़्यादा होता है... जैसे मोमबत्ती खुद जलकर पिघलती है, पर आसपास के अंधेरों को रौशन कर देती है—वैसे ही शिक्षक अपने संघर्षों, तकलीफों और अभावों को परे रखकर विद्यार्थियों की आँखों में सपनों की रौशनी भर देता है... शिक्षक की मुस्कान अक्सर उसके जीवन की गहरी पीड़ाओं को ढक लेती है... बाहर से वह शांत समंदर दिखता है, भीतर कितनी ही तूफानी लहरें छिपी होती हैं। फिर भी, “मनुष्य अपने दुःख से भाग सकता है, पर शिक्षक अपने कर्तव्य से नहीं” यही उसका कर्म है और कर्म ही धर्म... वह केवल किताबों के पन्नों तक सीमित नहीं रहता। कक्षा में बैठा वह जीवन का दार्शनिक भी है, जो विद्यार्थियों को सिखाता है कि “सपनों से बड़ी कोई दौलत नहीं और मेहनत से बढ़कर कोई पूजा नहीं।” कभी मित्र बनकर विद्यार्थियों की उलझनों को हल्का करता है, तो कभी बड़े भाई की तरह डाँटकर राह दिखाता है... जैसे पेड़ अपने फल खुद नहीं खाता, वै...