छठ : लोक आस्था का महापर्व
छठ... यह दो अक्षरों का शब्द अपने भीतर एक अनूठी संस्कृति को समेटे हम बिहारियों के लिए एक एहसास है... यह. महापर्व बहुत ही खास है, क्योकिं यह पर्व दूर गए अपनों को लाता पास है। परदेश गए वो अपने इसी महापर्व में वापस अपने घर लौटते हैं और आस्था के जल में डुबकी लगाकर इन चार दिनों तक चलने वाले महापर्व में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
इस महापर्व की शुरुआत कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को नहाय-खाय के साथ शुरू होती है। इस दिन प्रातःकाल पूरे घर की साफ-सफाई के बाद स्नान-ध्यान करके पूरी शुचिता के साथ कदुआ-भात पकाया जाता है और प्रसाद स्वरूप पूरा कुटुंब उसका सेवन करता है। पूरे घर में अलौकिक - दिव्यता का माहौल निर्मित होता है, जिसमें शारदा सिंहा की मधुर आवाज़ में छठ गीत की ध्वनि पूरे वातावरण को छठमयी कर देती है।
इस छठ से जुड़ी अनेक पौराणिक कहानियाँ हैं, जिसमें सबसे प्रचलित कथा के अनुसार त्रेतायुग में माँ सीता के द्वारा बिहार के मुंगेर में गंगा तट पर की गई उनकी -सूर्य उपासना है जहां आज भी उनके चरण चिह्न की मौजूदगी की मान्यता है।
वहीं द्वापर युग में पांडवो के विजय के लिए द्रोपदी ने भी छठी मईया की उपासना की थी और अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजते हुए यह पर्व आज भी बिहार की लोक आस्था का महापर्व बना हुआ है।
नहाय-खाय के अगले दिन पंचमी को व्रती दिन भर उपवास के पश्चात संध्या बेला में पूजा-अर्चना के उपरांत खरना के प्रसाद का सेवन करते हैं, जिसमें अपनी-अपनी क्षमता व उपलब्धता के आधार पर खीर-रोटी, दाल-भात, दूध-भात के साथ गुड़ के रवा का प्रयोग होता है। इस खरना के प्रसाद को अपने कुटुंब के साथ-साथ मित्रों व रिश्तेदारों को भी प्रदान किया जाता है। खरना के प्रसाद सेवन करके व्रती लगभग छत्तीस घण्टे निर्जला उपवास का संकल्प लेते हैं..
षष्ठी के ब्रह्म मुहूर्त में घर के कुछ लोग स्नान-ध्यान करके पूरी शुचिता के साथ छठ का महाप्रसाद ठेकुआ की निर्मिति के लिए एकत्रित होते हैं। ठेकुआ महाप्रसाद को चावल व गेहूं के आटे के साथ गुड-चीनी मिलाकर शुद्ध घी में तैयार किया जाता हैं। वहीं घर के कुछ लोग सुबह-सुबह बाजार से फलों की खरीदी करने
निकल पड़ते हैं.. यह पर्व हमारे उन उपेक्षित फलो-सब्जियों (सुथनी, गागर निम्बू जैसे फलों) को भी वरीयता का दर्जा दिलवाता है, जो आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी श्रेष्ठता साबित नहीं कर पाए...
षष्ठी की संध्या को व्रती के साथ पूरा कुटुंब सज-धज कर गाँव के तालाब, पोखर या नदी के किनारे एकत्रित होकर डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देता है। यह प्रतीकात्मक रूप से इस बात की उद्घोषणा है कि हमारी संस्कृति हर निराश व्यक्ति को यह ढाढस देती है कि निराशा के बाद आशा का सूर्योदय होना तय है और साथ ही यह डूबते सूर्य को अर्घ्य अनुभव को सम्मान का प्रतीक है।
संध्या अर्घ्य के पश्चात घर लौटकर पूरा परिवार एकजुटता के साथ लोकगीत गाता है। जीवन के रफ्तार के साथ तालमेल बिठाने जो नई पीढी शहर गई है, उनको एहसास कराता है कि दो कमरों से बड़ा भी घर होता है जहाँ मिल बैठकर हर समस्या का हल होता है। सप्तमी के ब्रह्म मुहूर्त में उठकर पूरा परिवार स्नान ध्यान करके, सज-संवरकर व्रती के साथ पुनः उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने घाट पर जाते हैं और लौटते वक्त प्रसाद का वितरण करते हुए बड़े उत्साह के साथ आशीष प्राप्त करते हैं।
यह पर्व समानता की ऐसी उद्घोषणा है कि इसके किसी पूजन कार्यक्रम में किसी पांडित्य कर्म की कोई आवश्यकता नहीं.. यह पूर्णतः प्रकृति के प्रत्यक्ष देव सूर्य की उपासना का एक महापर्व है। आज यह सिर्फ बिहार क्षेत्र तक सीमित. पूरे विश्व में जहां कहीं भी बिहारी संस्कृति ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है वहां छठ महापर्व मनाया जा रहा है। भारत के अधिकांश पर्व पर बाजारवाद और पश्चिमीकरण का प्रभाव बढ़ता जा रहा है, किंतु छठ आज भी लोक आस्था का एक महापर्व है जो मूल प्रकृति व संस्कृति को संजोए रखे हैं।
प्रभाकर कुमार 'माचवे'
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