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समान खेल, समान वेतन ! क्रिकेट के एक मैच खेलने का कितना फीस मिलता इनको ?

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BCCI ने भारतीय महिला क्रिकेट के बेहतरीन प्रदर्शन और बढ़ती लोकप्रियता को देखते हुए इन्हें भी पुरुषों के बराबर फीस देने की बात कही है... दिखने में, ये बस एक साधारण सी खबर लग रही है...मगर, मुझे इस ख़बर में भारत के बदलते दौर की बानगी मिल रही है...21वीं सदी निःसन्देह भारत की सदी है,इस सदी में भारत विश्व गुरु बनेगा इसमें कोई दो मत नहीं है... मगर, सवाल उठता है कि इस विश्व गुरु के सपने को साकार करने में सबसे अहम भूमिका किनकी होगी ? मेरा सीधा और स्पष्ट जवाब होगा..."नारी शक्ति" पिछले कई सदियों से भारत की अर्थव्यवस्था में महिलाओं की सीधी भागीदारी नहीं हो रही थी, जो हिंदुस्तान की गरीबी का एक महत्वपूर्ण कारण रहा है...बदलते दौर में , महिलाओं की अर्थव्यवस्था में सीधी भागीदारी न सिर्फ आर्थिक रूप से भारत को मजबूत बनाएगा बल्कि साथ ही साथ इससे भारत समाजिक और राजनीतिक रूप से भी और मजबूत होगा... BCCI के द्वारा लिए इस फैसले के कई मायने हैं, इससे न सिर्फ़ लड़कियों का क्रिकेट के प्रति आकर्षण बढ़ेगा बल्कि साथ ही साथ अन्य खेल और संस्थानों पर भी "समान काम, समान वेतन" का दबाव बढ़ेगा.. आर...

वाह रे ! कोटा नगरी...सच में फैक्ट्री हो...फैक्ट्री...

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वाह रे ! कोटा नगरी...सच में, फैक्ट्री हो ...फैक्ट्री...  कोटा फैक्ट्री....जी, हां यह एक फैक्ट्री ही है जहां इंसानी बच्चें को मशीन बनाना जाता है...उसकी संवेदनाओ को मारकर, उसके भीतर के मनुष्यत्व को मारकर , उसके सपनों को मारकर, बस...एक प्रतिस्पर्धी बनाया जाता है... आपको लग रहा होगा, ऐसा क्या है इस तस्वीर में ?  यह एक सीलिंग फैन की तस्वीर है, जिसे एक जाली से ढक दिया गया है... आपके मन में सवाल आया होगा, आख़िर पंखे को जाली से ढंकने की क्या जरूरत ? जी हां,दोस्तों ...पंखे को जाली से ढका है ताकि कोई बच्चा जिसे मशीन बनाने की अंधी चाहत में उसके माता-पिता इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रवेश प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की माया नगरी में भेज देते हैं...और इस माया नगरी में प्रवेश के बाद बच्चा बच्चा नहीं रहता मशीन बन जाता है...उसे बड़े सलीके से मशीन बनाया जाता... अपने दिमाग पर पड़ने वाले दबाव से  परेशान होकर,जब वो अंधेरे कमरे में चीखता है तो उसकी चीख बाहर सुनाई  नहीं देती,वो भीतर ही भीतर घुट जाता है...   न वो चीख बच्चें के माता-पिता को ही सुनाई देती,जो छोटे शहर , गांव कस्बो...

ये हार बहुत कुछ सिखाती है !

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दो बार के विश्व विजेता वेस्टइंडीज विश्व कप से बाहर ! ज़िन्दगी हो या खेल यहां सिर्फ एक ही चीज़ निश्चित है,कि यहां कुछ भी निश्चित नहीं...                                 जीवन में निश्चितता,स्थायित्व के पीछे भाग रही युवा पीढ़ी को इस घटना से सीखना चाहिए कि आप कभी भी अर्श से फ़र्श  पर गिर सकते या फर्श से अर्श पर पहुंच सकते...  दो बार की विश्व विजेता टीम भी आयरलैंड जैसी छोटी टीम से हारकर विश्व कप प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाती है...और हम यहां भविष्य की कोरी कल्पना में अपने आज को गवां रहे...स्थायित्व की चाह की वजह से ही यहां कई प्रतिभाएं खो जाती है...आज जो खुद को सिकन्दर मान रहे उन्हें इस अहम से बचना चाहिए और जो हताश हैं कि अब कुछ नहीं हो सकता उन्हें बस लगे रहना चाहिए...क्योंकि  जीवन मे कुछ भी स्थायी नहीं... न खुशी, न ग़म ...न प्रसिद्धि न गुमनामी... तो आख़िर क्या है जीवन ? जीवन एक गूढ़ रहस्य है, जीवन सत्य है...जीवन अद्भुत है, विलक्षण है...जीवन सृष्टि और स्रष्टा का एकाकार होना है... तो क्या हो जीवन...

क्या भारत पाकिस्तान से भी ज्यादा भूखा है ?

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प्रश्न :- क्या हिंदुस्तान अपने पड़ोसी देशों की तुलना में ज्यादा भूखा है ?  मेरा उत्तर :- बिल्कुल नहीं.... अगला प्रश्न :- तो क्या ये आंकड़े झूठे हैं ? मेरा उत्तर :- बिल्कुल,आंकड़े के लिए प्रयोग किया गया पैमाना अनुचित है... 2022 में जारी इस सूचकांक में भारत 107वें स्थान पर, वहीं पाकिस्तान 99वां, बंगलादेश 84 वें, नेपाल 81वें स्थान पर है... यूरोपियन एजेंसियों के द्वारा इस सूचकांक के लिए चार पैमानों का निर्धारण किया गया है :- 1.अल्पपोषण - उम्र के हिसाब से वजन का कम होना 2.चाइल्ड वेस्टिंग -  पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों का कद (लम्बाई) के हिसाब से वजन का कम होना 3.स्टंटिंग :- उम्र के हिसाब से कद का कम होना 4. पांच वर्षों से कम के बच्चों का मृत्यु दर इन चार पैमानों में दो पैमानें चाइल्ड वेस्टिंग और स्टंटिंग को सार्वभौमिक नहीं माना जा सकता, क्योंकि लम्बाई और वजन सिर्फ भोजन पर निर्भर नहीं करते, ये मूलतः क्षेत्रीयता, भौगोलिक जलवायु और अनुवांशिकता पर भी निर्भर करते हैं... अतः, इस सूचक के पैमाने सार्वभौमिक नहीं होने के कारण इसे एक आदर्श सूचक नहीं माना जा सकता... प्रभाकर कुमार 'म...

अब वो चिट्ठी नहीं आती !

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अब चिट्ठी नहीं आती.... वो भी क्या दिन थे,जब चिट्ठी आया करती थी...अपने साथ संवेदना भरी सन्देशा लाया करती थी...चिट्ठी जिसमें संलिप्त होते थे पिताजी की डांट,माँ की दुलार,बहन का स्नेह,भाई की परवाह.... "आज फोन पर बातें तो होती है हज़ार...मगर वो प्यार नहीं...चिट्ठी के लिए बेसब्री भरा वो इंतज़ार नहीं....शब्दों का जादुई संसार नहीं...संवेदना भरी पुकार नहीं...." आधुनिकता की दौर में यक़ीनन हमनें बहुत कुछ खोया है, करीब आने की जद्दोजहद में न चाहकर भी दूर हो गए हैं हम...फोन पर की गई घण्टों बातें बेफिजूल लग रही है, वो चिट्ठी दौर ही कितना प्यारा था, कितनी बेसब्री होती थी... बॉर्डर से सब सैनिक का ख़त उसके घर आता होगा तो कितनी सहजता से छलक पड़ते होंगे आंसू...कितनी मासूमियत से संस्कार भरे शब्दों के आवरण में पूछता होगा वो अपनी पत्नी का हाल... जब एक प्रेमी अपनी प्रेमिका को लिखता होगा पहला ख़त तो कितनी संवेदना होगी उसमें, वो झिझक...वो डर...वो प्रेम का इजहार...वो बातें...वो मुलाकातें...और न जाने क्या-क्या ? सच में, आज चिट्ठी नहीं आती... डिजिटल दौर में वीडियो कॉल पर की गई बात में भी वो एहसास न...