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ऐसे मनाये 'कलम के सिपाही' का जन्मदिन !

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समाज की विषमताओं पर कलम से चोट का प्रहार करने वाले "कलम के सिपाही" का आज जन्मदिन  है...आज मुझे ज्वर से तड़पते एक ऐसे व्यक्ति का चेहरा सामने दिख रहा जिसे परमात्मा ने जीवन के अंतिम दिनों में शारीरिक वेदना के गहरे आघात दिये... प्रेमचन्द्र की कलम समाज के चीखती पुकार को,अंतर्मन में उपजी पीड़ा को,परिवार के आंतरिक कलह को,अंग्रेजी शासन के शोषण को,बदलते वक्त की तस्वीर को जीवंतता के साथ पन्नो पर उकेरती है...                                           प्रेमचन्द्र के उपन्यास हो या फिर कहानियां...अपने आप में जीवन की समग्रता को समेटने का अद्भुत काबिलियत रखती है...                                            प्रेमचन्द्र हिंदी साहित्य से लोगो को जोड़कर रखने वाले एक गज़ब के कथानक थे...आज प्रेमचन्द्र की आत्मा खुद को न जाने क्यों कोसती होगी, हिंदी के गिरते स्तर,लेखको के व्यापारपने पर...

फ़र्श से अर्श तक का सफ़र

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विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की जीवन्तता का इससे बेहतरीन उदाहरण और कुछ नहीं हो सकता...जब समाज के सबसे निचले तबके से आने वाली एक महिला देश के शीर्ष पर पहुंचती है... लिंग व जाति के आधार पर भेदभाव करने के झूठे आरोप  लगाकर जिस पाश्चात्य संस्कृति ने हम भारतीयों को असभ्य कहने की जहमत उठायी थी,जिन्होंने अपने शोषण को हमें सभ्य बनाने के प्रयास के नाम दिए थे,उनके गालों पर तमाचा है यह...  भगवान जगन्नाथ की साधिका व राघवेंद्र राम सरकार को ध्येय-पथ सुझाने वाली हमारी माँ शबरी की वंशबेलि, आदरणीय  श्रीमती द्रौपदी मुर्मू का देश के शीर्ष पद पर सुशोभित होना न सिर्फ भारतीय लोकतंत्र बल्कि हमारी सनातन संस्कृति के जीत का उत्सव है...और समाज के सबसे निचले स्तर के व्यक्ति को एक भरोसा कि लोकतंत्र में फ़र्श से अर्श तक का सफ़र किया जा सकता है... भारतीय गणतंत्र के राज-उपवन को यह पवित्र वनफूल मंगलकारी हो और पूरे विश्व में इसकी सुवास फैलती रहे... मुझे उम्मीद है देश की नवनिर्वाचित राष्ट्रपति देश की राजनीतिक पटल पर बिखरे और संकुचित विपक्ष की वजह से सत्ता के निरंकुश और असंवेदनशील होने की संभावना को ...

श्रीलंका से मैंने क्या सीखा ?

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जनता के हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती है... जनता जिधर चाहती है,काल उधर ही मुड़ती है... बीता गवाक्ष अम्बर दहके जाते हैं, दो राह समय के रथ का घर्घर नाद सुनो.... सिंहासन खाली करो कि जनता आती है...  श्रीलंका के इस हाल की पटकथा किसी एक दिन में नहीं लिखी गयी है...राजनीति के सत्ता पर परिवारवाद के दीमक ने उसे ऐसा खोखला किया है कि आज उसकी जनता दाने-दाने को मोहताज़ हो गयी है...                           पड़ोसी की इस बदहाली पर चुटकी लेने वाले इससे सतर्क हो जाएं...यदि राजनीति की धुरी यदि सिर्फ एक परिवार या किसी व्यक्ति विशेष के ही इर्द गिर्द घूमेगी तो यही हश्र होगा... श्रीलंका की इस घटना से मुझे मिली निजी जीवन के लिए एक बड़ी सीख - कभी भी अपने जीवन की अर्थव्यवस्था को सिर्फ एक तम्बू पर खड़े रहने न दें, मतलब multi source of income 21वीं सदी की मौलिक आवश्यकता है...वरना कोरोना जैसे भूचाल तबाही मचा देंगे"... प्रभाकर कुमार 'माचवे'  की कलम से...

धर्म के नाम पर नफ़रत फैलाने वालों इनसे सीखो....

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मेरे देशप्रेमियों आपस में प्रेम करो..मेरे देशप्रेमियों... पटना के राजाबाजार से जब ये अर्थी निकली तो आस-पास के लोग देखकर अपनी दांतों तले उंगलियां दबा लिए... 75 वर्षीय रामदेव जी का शव मोहम्मद रिजवान, अरमान, राशिद और इजहार के कंधों पर था। ये चारों "राम नाम सत्य है" बोलते हुए शव को गंगा घाट तक ले गए और हिंदू रीति से रामदेव जी का अंतिम संस्कार किया...रामदेव जी इनके दुकान पर पिछले 25 वर्षों से काम करते थे... इस घटना ने साबित कर दिया कि आज भी इंसानियत जिंदा है...कुछ सरफिरों की वजह से हमारी गंगा-जमुनी तहज़ीब कभी खत्म नहीं हो सकती.... उदयपुर,अमरावती की घटनाओं ने भीतर ऐसा ज़हर घोला है कि नफ़रत जीतने लगी थी,इंसानियत हारने लगी थी...मगर,इस ख़बर ने मुझे फिर से एक भरोसा दिया है कि हिंदुस्तान जिंदाबाद था,जिंदाबाद है और जिंदाबाद रहेगा... जीवन में सबसे मुश्किल दौर से व्यक्ति तब गुज़रता है जब उसका भरोसा टूटने लगता है...इस ख़बर ने मेरे जैसे कितनों के टूटते भरोसे को एक उम्मीद तो जरूर दिया है... प्रभाकर कुमार 'माचवे'  की कलम से... #उम्मीद #इंसानियत