हर निरर्थक व्यर्थ नहीं होता...
कभी-कभी जीवन में हम ऐसे कर्मों में उलझ जाते हैं, जिनका कोई स्पष्ट परिणाम नहीं दिखता। समय और ऊर्जा बहाते हैं, फिर भी हाथ में कुछ ठोस नहीं आता। लोग कहते हैं – “यह तो बेकार था, निरर्थक था, व्यर्थ में ही अपनी ऊर्जा व समय गवाएं...." पर क्या सच में हर निरर्थक प्रतीत होने वाली चीज व्यर्थ होती है ? क्या सच में वो महत्वहीन होती है ? क्या जीवन निर्माण प्रक्रिया में उनका कोई योगदान नहीं होता ? मैंने महसूस किया है कि कुछ अनुभव जीवन को आकार देने के लिए आते हैं, न कि परिणाम देने के लिए... सिर्फ परिणाम से ही सार्थकता का मूल्यांकन करना एकदम संकीर्ण सोच है... जैसे कोई नदी चट्टानों से टकराकर बहती है – न उसका कोई उद्देश्य है, न मंज़िल की प्राप्ति में सहायक... फिर भी वह रास्ता बनाते जाती है... और एक लंबे समय के बाद वही टूटी चट्टानों से मृदा बनती है, जो उस वक़्त व्यर्थ सा जान पड़ रहा था बाद में वही इस जीवन के बुनियादी तत्व के रूप में निर्मित होती है... हमारी विफलताएँ, हमारे रुकाव, हमारे अधूरे प्रयास – ये सब मिलकर एक आंतरिक गूंज बनाते हैं, जो हमें भीतर से परिष्कृत करती है। कभी एक कविता अधूरी...