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हर निरर्थक व्यर्थ नहीं होता...

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कभी-कभी जीवन में हम ऐसे कर्मों में उलझ जाते हैं, जिनका कोई स्पष्ट परिणाम नहीं दिखता। समय और ऊर्जा बहाते हैं, फिर भी हाथ में कुछ ठोस नहीं आता। लोग कहते हैं – “यह तो बेकार था, निरर्थक था, व्यर्थ में ही अपनी ऊर्जा व समय गवाएं...."  पर क्या सच में हर निरर्थक प्रतीत होने वाली चीज व्यर्थ होती है ? क्या सच में वो महत्वहीन होती है ? क्या जीवन निर्माण प्रक्रिया में उनका कोई योगदान नहीं होता ? मैंने महसूस किया है कि कुछ अनुभव जीवन को आकार देने के लिए आते हैं, न कि परिणाम देने के लिए... सिर्फ परिणाम से ही सार्थकता का मूल्यांकन करना एकदम संकीर्ण सोच है... जैसे कोई नदी चट्टानों से टकराकर बहती है – न उसका कोई उद्देश्य है, न मंज़िल की प्राप्ति में सहायक... फिर भी वह रास्ता बनाते जाती है... और एक लंबे समय के बाद वही टूटी चट्टानों से मृदा बनती है, जो उस वक़्त व्यर्थ सा जान पड़ रहा था बाद में वही इस जीवन के बुनियादी तत्व के रूप में निर्मित होती है... हमारी विफलताएँ, हमारे रुकाव, हमारे अधूरे प्रयास – ये सब मिलकर एक आंतरिक गूंज बनाते हैं, जो हमें भीतर से परिष्कृत करती है। कभी एक कविता अधूरी...

सफलता मतलब क्या ?

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सफलता… ये शब्द जितना चमकदार दिखता है, उतना ही उलझा हुआ भी है। मेरे लिए सफलता कोई मंज़िल नहीं, एक यात्रा है। वो यात्रा जो मुझे हर दिन थोड़ा और सजग बनाती है, थोड़ा और ईमानदार, और थोड़ी और आत्मा के क़रीब। दुनिया कहती है – बड़ी गाड़ी, ऊँचा ओहदा, तगड़ा बैंक बैलेंस = सफलता। लेकिन मेरी परिभाषा में सफलता है – सुबह सुकून से जागना और रात को संतोष के साथ सो जाना और  इस दौरान पूरी ऊर्जा से भयमुक्त होकर सही काम करना... सफलता है – जब मैं किसी बच्चे की आँखों में उम्मीद जगा सकूँ, जब मैं किसी के मन का बोझ थोड़ा हल्का कर सकूँ, जब मेरी आवाज़ किसी के भीतर आत्मविश्वास भर सके...जब मैं किसी के खिलखिलाते चेहरे की वजह बन सकूं... सफलता मेरे लिए यह भी है कि मैं जी सकूं... बिना झूठ बोले, बिना मुखौटे पहने, बिना किसी दिखावे के।  मैं खुद से कह सकूँ – "तू जैसा है, वैसा ही ठीक है।"  हाँ, कुछ बुराईयां है मुझमें, कुछ क्या...कुछ ज्यादा ही, जो समय, परिस्थिति व स्थान के साथ सुधरते जाएंगे...मगर, अपने मूल को भूलकर कोई भी अपने जीवन में वसंत का फूल नहीं खिला सकता...और मेरा मानना है कि जीवन में कोई परफ...

कल्पना का दर्पण और हकीकत की दरारें

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कल्पना का दर्पण और हक़ीक़त की दरारें कभी-कभी लगता है, मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी कल्पना है, और सबसे गहरी पीड़ा भी वही। कल्पना एक दर्पण है — चमकता हुआ, निर्मल, जादुई। इसमें हम वो देखते हैं जो हमें पसंद है — जैसे किसी ने हमें पूरे मन से चाहा, जैसे हमारा जीवन बिल्कुल वैसा है जैसा हमने चाहा था। इस दर्पण में दिखती हैं पूर्णता की छवियाँ, वो प्रेम जो कभी छूटा ही नहीं, वो सफलता जो थकी नहीं, वो मुस्कान जो नकली नहीं। मगर हक़ीक़त… वो दर्पण की पीठ है - दरारों भरी, खुरदुरी... हक़ीक़त में जो प्रेम है, वो अधूरा है। जो संबंध हैं, वो उलझे हैं। जो लक्ष्य है, वो थकाते हैं। हम कल्पना में उड़ते हैं, हक़ीक़त हमें खींच कर ज़मीन पर लाती है। फिर भी, यह विरोध नहीं, यह संबंध है। कल्पना हमें जीने की हिम्मत देती है, और हक़ीक़त हमें संभलने की समझ। मेरे जैसे एक भावुक इंसान को, कई बार ये भ्रम होता है कि जो मैं सोच रहा, जो मैं महसूस कर रहा — वही संसार है। मगर जैसे ही मैं उस स्वप्न से बाहर आता हूँ, हक़ीक़त कहती है —"इतना भी आसान नहीं।" कभी प्रेम में, कभी रिश्तों में, कभी अपने ही सपनों में  हम ऐसे उलझते है...

वो लड़की है...कोई सौदा नहीं !

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आज मेरी मुलाकात लगभग 50 की उम्र के करीब व्यक्ति से हुई,मुझसे बात की शुरुआत उन्होंने अजनबी की तरह ही की, बात ही बात में वे मुझे भांप रहे थे, मेरे विचारों को अपने अनुभव के तराजू में तौल रहे थे... फिर एकाएक सामाजिक, राजनीतिक मु‌द्दों को छोड़ते हुए वे मुझसे निजी सवाल करने लगे, मसलन... क्या करते हो?, घर में कौन-कौन ? फिर उन्होंने मुझसे मेरे पिताजी का नाम पूछा, शायद नाम सुनकर उन्हें विशेष संतुष्टि नहीं मिली... फिर उन्होने मेरे दादा जी का नाम पूछा, शायद उन्हें यहाँ भी संतुष्टि नहीं मिली... क्योंकि इन दोनों नाम के सरनेम में कुमार लगा था.. समाजशास्त्र का विद्यार्थी होने के नाते मैंने उनके नाम पूछने के मंशे को भांप लिया... असल में वो नाम नहीं, सरनेम जानना चाहते थे जिससे वो मेरी जाति का अनुमान लगा सके। उनकी संतुष्टि के लिए मैंने खुद ही अपनी जाति की जानकारी उन्हें दी, जाति नाम जानते ही उनकी आँखों में एक खुशी की झलक दिख पड़ी और फिर मेरे घर का पता पूछकर वो मेरे परिवार के साथ वर्षों पुराने संबंध को जोड़ने का प्रयास करने लगे। बात ही बात में उन्होंने मुझसे पूछा, शादी...