शक्ति की भक्ति और ऐसी बेबकूफी...
शक्ति की भक्ति और फिर ऐसी बेबकूफी... विचारणीय है,हम सभी बड़े उत्साह,आस्था और श्रद्धाभाव से नौ दिनों तक शक्ति उपासना करते हैं, कई लोग अन्न का त्याग कर फलाहार पर रहते,कुछ सात्विक आहार पर रहते...और अंतिम तिथि को मांसाहार का सेवन करते! तनिक विचार कीजियेगा मेरी बात पर...क्या यह मांसाहार वैज्ञानिक संदर्भ में सार्थक है? मैं अपने आलेख में कोशिश करूंगा कि आपको तर्कसंगत बात बताऊं। नौ दिनों तक सात्विक आहार का सेवन करने से हमारे पाचन तंत्र को बहुत आराम मिलता है और वो खुद को अच्छे तरीके से संतुलित कर लेते हैं।पाचन तंत्र को आराम मिलने के कारण प्राणवायु का प्रवाह मस्तिष्क की ओर अधिक मात्रा में होता है जिससे उनकी क्षमता बढ़ती है और दिमाग को पोषण मिलता है,किंतु फिर एकाएक ऐसे भोजन को खाना जिसे पचने में अधिक वक़्त लगे,एक स्तनधारी होने के कारण शरीर को उसकी कोडिंग को ऊर्जा में बदलने में बहुत मेहनत करने पड़े जिस कारण मस्तिष्क की ओर जाने वाली प्राणवायु एकाएक कम हो जाती है,जिससे मानसिक परेशानी होने की संभावना बढ़ जाती है... क्या आपको नहीं लगता इंजन की सफाई करने के तुरन्त बाद उस पर एकाएक ओवरलोड नही...