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अर्धनारीश्वर का यथार्थ

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शिव पार्वती के बिना शव...शंकर अपने गौरी के बिना कंकड़ है... आज महाशिवरात्रि के मौके पर मेरे मन में सवाल आया कि जिस संस्कृति ने देवियों को देवताओं से भी श्रेष्ठ माना है,देवताओं के अस्तित्व की मूल देवियां हैं...वो संस्कृति 21वीं सदी में भी आधुनकिता के वायुयान पर सवार होकर अपने मौलिकता के ईंधन को क्यों भूल गयी है...ईंधन के बिना ये वायुयान न जाने हमें कहाँ की यात्रा करवाएगा... जीवन की सम्पूर्णता के लिए व्यक्तित्व में नारीत्व और पौरुषत्व के गुण अनिवार्य हैं.. हम कब तक इस दुनिया को लिंग भेद के नाम पर यूं बाटते रहेंगे? यक़ीन मानिए, इस बंटवारे ने हमारा बहुत नुकसान किया है... एक स्त्री के भीतर करुणा, दया,ममता और वात्सल्य की अधिकता का होना उसकी कमजोरी नहीं हो सकती;और वहीं एक पुरूष के भीतर साहस,दृढ़ संकल्प और निडरता की अधिकता उसके अहंकार का परिचायक नहीं... मेरा ऐसा मानना है,कि हर पुरुष के भीतर स्त्री और हर स्त्री के भीतर पुरुष हो...ये पुरुष व स्त्री सिर्फ़ लिंग न होकर एक आपेक्षित गुण हो..स्वभाव हो.. नारी और नर की लैंगिक समानता की वकालत करना मुझे पता नहीं क्यों  इस पीढ़ी की सबसे बड़ी मूर...

ज़िन्दगी : ताश का खेल

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52 पत्तों के ताश का खेल है यह जिंदगी...  बड़ा रोचक है यह खेल ..हर किसी के पास अपने- अपने पत्ते, हर कोई एक दूसरे से अनजान..  फिर भी सब में जीतने का वही जुनून.. वही प्यास.. वही शिद्दत...  जिंदगी हो या ताश का खेल इसकी अनिश्चितता ही इसे रोचक बनाती है। यदि जिंदगी में सब कुछ पूर्व निर्धारित हो तो जिंदगी नीरस हो जाएगी । यकीनन, ताश के खेल में पत्ते हर बार मन पसंद नहीं आते, कभी बुरे पत्ते आते तो कभी अच्छे पत्ते ..  ताश के खेल की तरह जिंदगी भी कुछ अपना खेल ऐसे ही खेला करती है । बुरे पत्ते देखकर खेल छोड़ देना सबसे बड़ी मूर्खता है और अच्छे पत्ते पाकर कोई अपनी जीत की गारंटी कर रहा है यह भी सरासर अन्याय ही है।  खेल को खेलना और जिंदगी को बेहतर बनाने के प्रयास में जीना कम बड़ी उपलब्धि नहीं है। जिस तरह कम शक्ति वाले पत्ता भी मौका मिलते ही बड़ा खेल दिखा देता है ठीक उसी प्रकार कभी भी कोई भी जिंदगी के इस रंगमंच पर बाजी मार सकता है बस जब तक जिंदगी है खेल जारी रखना होगा... प्रभाकर कुमार 'माचवे'