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शब्द ही गढ़ते आपकी नियति...

चित्र
जीवन की रूपरेखा हमारे द्वारा चाहे-अनचाहे किये गए शब्दों के द्वारा ही गढ़ी जा रही है...हम बिल्कुल अनजान होकर अपने जिंदगी की पटकथा लिख रहे हैं...हमारा अवचेतन मन अपने आस-पास,अपने भीतर के शब्द संसार का ही एक चित्रण करता है...और हमारी नियति कहीं न कहीं हमारे अवचेतन मन में बने इसी सजीव चित्र का निरूपण होती है... सुनने में थोड़ा अज़ीब लगेगा,मगर यही सत्य है.... हम अपने नियति को खुद बनाते हैं, चाहे वो अपने पक्ष में हो या विपक्ष में.... तो सवाल उठता है कि जब हम अपने नियति के नियंता है,निर्माणकर्ता हैं...तो फिर परिणाम हमारी इच्छानुकूल क्यों नहीं हो पा रही ? जवाब बिल्कुल सरल और स्पष्ट है,क्योंकि हम जागरूक ही नहीं है...हम अनायास के इतने आदी हो चुके हैं कि हमने अपनी खुशियों की चाभी किसी और के हाथों में सौंप दी है... हमारा रिमोट किसी और के हाथ में है और हम बस परिस्थितियों की कठपुतली बनकर रह गए हैं... एक उदाहरण से समझने का प्रयास करें... एक वाक्य है, "काफी अकेला हूँ"...और दूसरा वाक्य है, "अकेला काफी हूँ"... बस, एक शब्द की क्रमबद्धता में परिवर्तन पूरे वाक्य को रोमांचित तरीक...