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एक ज्योति मौर्या ने पूरे पुरुष जाति के भीतर के पुरुष को जगा दिया !

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वाह रे...पुरुष की दमन प्रवृत्ति जो वर्षों से पुरुष प्रधान समाज के द्वारा पोषित होती आ रही थी,विगत कुछ वर्षों में मंहगाई की मार की वजह से अपनी पत्नियों को घर से बाहर काम विशेषकर शिक्षण व नर्सिंग/मेडिकल क्षेत्रों में जाने की विवशतापूर्ण ही सही अनुमति देने को तैयार हुआ था...उसे ज्योति मौर्या केस ने फिर से संजीवनी दे दी है...जिसे देखो वो इस बात की वकालत डंके की चोट पर कर रहा कि औरत का स्थान पैरों की जूती ही है,इसे सिर पर मत चढ़ाओ...घर ही चार चौखट ही इसकी मर्यादा है,घरेलू काम ही करना इसका मौलिक और नैतिक धर्म है... सन्देह के बीज की जो बात मैंने पिछले दो दिनों पहले की थी,अब वो पूरी विषाक्तता के साथ दमनकारी पुरुष को एक जीवंत उदाहरण दे दिया है.. वो बड़े जोर शोर से कह रहा कि सूर्यवंशम का हीरा ठाकुर बनने चला,मिल गया न धोखा... औरतें धोखेबाज़ होती ही है...वो मतलबी होती...ये बात जिस बेफिक्री से आप अपनी प्रेमिका और पत्नी को कह रहे, क्या उसी बेबाकी से आप ये बात अपनी मां के लिए कह सकते है ! कहीं आप ये तो नहीं सोच रहे,कि आपकी मां का अनपढ़ होना या कम पढ़ी लिखी होना ही उसके उत्तम चरित्र के कारण ...