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दिल बेचारा

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आंखों से छलके आँसू की बूंदे...कुछ अज़ीब सा झकझोरा फ़िल्म "दिल बेचारा"ने...इस फ़िल्म को देखने से पहले मैंने ये तय किया था कि ये मानकर देखूंगा सुशांत सिंह राजपूत अभी जिंदा हैं,मैंने अपने दिल दिमाग को साफ निर्देश दे दिए थे कि इन्हें वो अभी जिंदा ही माने और बिल्कुल बस "मैनी" के कैरेक्टर को ही कहानी...शुरुआत शानदार रही,पूरी तरह से दर्द भरी संवेदना "किजी वासु" के साथ जुड़ती चली गयी...फ़िल्म ने एक मोड़ तब लिया जब "मैनी" के नकली टांगों को दिखलाया गया,यह देखकर दिल "मैनी" की जिंदादिली देखकर बहुत खुश हुआ..और अब तक सुशांत सिंह राजपूत ने फ़िल्म में साबित कर दिया था कि लोग रियल लाइफ में मरने के बाद ऐसा क्यों कह रहे थे,"लाश की तफ़्तीश अच्छे से कर लेना..कलाकार उम्दा है,क्या पता किरदार में हो"...अब तक दर्द की संवेदना "किजी"के साथ ही थी...मगर फ़िल्म के अंतिम पड़ाव ने फिर से एक बार झकझोर दिया,असल में वो फ़िल्म में हँसता,मुस्कुराता, हँसाता चेहरा "मैनी" ही मौत के दर पर था...और यहां जाकर "मैनी" और "सुशांत"ए...